हर समीकरण की सीमा लांघने वाला उत्तर प्रदेश का यक्ष प्रश्न

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हर समीकरण की सीमा लांघने वाला उत्तर प्रदेश का यक्ष प्रश्न

लखनऊ 
राजनीति में प्रायः चुनावी अंकगणित, जातिगत गोलबंदी, क्षेत्रीय समीकरण और घोषणापत्रों के बड़े-बड़े दावे ही जीत-हार का मुख्य आधार माने जाते हैं। चुनावी मंचों से गूंजने वाले नारों, रैलियों में उमड़ती भीड़ और मीडिया के विश्लेषकों की बहसों का अपना एक निश्चित गणितीय हिसाब होता है। परंतु इतिहास साक्षी है कि जब किसी राज्य के राजनीतिक क्षितिज पर कुछ ऐसी अभूतपूर्व संरचनाएं और सांस्कृतिक प्रतीक उभर आते हैं, तो उन्हें केवल आंकड़ों के पारंपरिक तराजू पर नहीं तौला जा सकता। उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी संग्राम जब-जब आकार लेगा, तब-तब एक मौलिक और यक्ष प्रश्न सतह पर आएगा—आखिर वह क्या है, जो इस विशाल प्रदेश में केवल योगी आदित्यनाथ कर सकते हैं, कोई अन्य राजनेता नहीं?

पारंपरिक राजनीति के व्याकरण को चुनौती देती छवि
उत्तर प्रदेश का राजनीतिक इतिहास गवाह रहा है कि यहां का जनादेश अधिकांशतः जातियों के जोड़-तोड़, कुनबे के हिसाब-किताब और सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द ही सिमटता रहा है। दशकों तक दलों ने केवल जातिगत जनगणना और क्षेत्रीय क्षत्रपों के गठजोड़ के आधार पर सरकारें बनाई और चलाई हैं। परंतु जब भगवा वस्त्रधारी गोरक्षपीठाधीश्वर सत्ता संभालते हैं तो राजनीति का यह पारंपरिक व्याकरण पूरी तरह बदलने लगता है। जिस व्यक्ति ने अपना व्यक्तिगत जीवन, कुनबा और पारिवारिक मोह से पूरी तरह ऊपर उठकर संन्यास का मार्ग चुना हो, उसकी सामाजिक और राजनीतिक छवि स्वतः ही जाति के संकीर्ण दायरों को लांघ जाती है। जब विपक्षी दल अलग-अलग जातियों और उप-जातियों का गणित साधने में व्यस्त होते हैं, तब योगी आदित्यनाथ एक सर्वव्यापी और व्यापक सांस्कृतिक पहचान खड़ी कर देते हैं। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभाव है, जिसे कोई भी पारंपरिक राजनेता अपनी अंतर्निहित जातिगत सीमाओं और पारिवारिक दायित्वों के कारण आसानी से नहीं दोहरा सकता। संन्यास और समर्पण की यह छवि उन्हें राजनीतिक जोड़-तोड़ से परे एक अलग ही आधार प्रदान करती है।

शासन की "कठोर मुद्रा" और सुरक्षा का मनोवैज्ञानिक भाव
उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक शब्दावली में अपराध के प्रति “जीरो टॉलरेंस” और “बुलडोजर कार्रवाई” केवल एक प्रशासनिक नीति का हिस्सा मात्र नहीं रही, बल्कि वह एक मजबूत राजनीतिक ब्रांड का रूप धारण कर चुकी है। अतीत के उस उत्तर प्रदेश को याद कीजिए, जहां कानून-व्यवस्था पर निरंतर गंभीर प्रश्नचिह्न लगते थे, व्यापारी पलायन के लिए विवश थे और माफिया का अपना समानांतर शासन चलता था। उस पृष्ठभूमि के विपरीत, एक कठोर प्रशासक की भांति खड़े होकर अपराधियों और माफिया तंत्र के मन में कानून का भय पैदा करना, यह वह अभेद्य राजनीतिक पत्ता है, जिसे केवल योगी आदित्यनाथ ही पूर्ण नैतिक अधिकार के साथ खेल सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब विपक्षी दल इस आक्रामक नीति की प्रक्रियागत और संवैधानिक आलोचना करते हैं, तो वे अनजाने में योगी की इसी “दृढ़ संकल्प और सख्त प्रशासक” वाली छवि को जनता के बीच और अधिक सशक्त बना देते हैं। जनता सुरक्षा के इस अहसास को किसी भी राजनीतिक तर्क से ऊपर रखती है।

'विकास' और 'विरासत' का अभूतपूर्व समन्वय
भारतीय राजनीति में लंबे समय से दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी धाराएं विद्यमान रही हैं। एक तरफ वे नेता रहे हैं जो केवल आधुनिकता, अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और आर्थिक विकास की बात करते थे, तो दूसरी तरफ वे जो केवल परंपरा, धर्म और सांस्कृतिक अस्मिता के पक्षधर थे। योगी आदित्यनाथ ने इन दो विपरीत धाराओं को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। उनके एक हाथ में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, गंगा एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे और डिफेंस कॉरिडोर का आधुनिक खाका है, तो दूसरे हाथ में भव्य अयोध्या का राम मंदिर, काशी का दिव्य विश्वनाथ धाम, मथुरा-वृंदावन का कायाकल्प और महाकुंभ का अभूतपूर्व सांस्कृतिक वैभव है। वे “विरासत” को बिना किसी हिचकिचाहट के सार्वजनिक रूप से स्वीकारते हैं और उसे 'विकास' के आधुनिक पहियों पर आरूढ़ कर देते हैं। यह समन्वय किसी ऐसे राजनेता के लिए अत्यंत कठिन है, जिसे सांस्कृतिक प्रतीकों को छूने में राजनीतिक संकोच होता हो, धर्मनिरपेक्षता का आवरण या वोटबैंक खिसकने का भय सताता हो।

सशक्तीकरण का नया मानक: आधी आबादी का अटूट विश्वास
चुनावी बहसों में अक्सर मुफ़्त योजनाओं, वित्तीय रेवड़ियों और कैश ट्रांसफर के मुद्दे छाये रहते हैं। विभिन्न दल महिलाओं को आकर्षित करने के लिए कई तरह के आर्थिक वादे करते हैं। परंतु राज्य की “आधी आबादी”, यानी महिला मतदाताओं के लिए, वास्तविक और धरातलीय सशक्तीकरण का अर्थ क्या है? उत्तर प्रदेश के छोटे कस्बों, गांवों और सुदूर ग्रामीण अंचलों में शाम ढलने के बाद महिलाओं का निडर होकर बाहर निकलना, बेटियों का बिना किसी भय के स्कूल और कॉलेज जाना—यह वह प्रत्यक्ष अनुभूति है, जिसे योगी सरकार अपने सुशासन की सबसे बड़ी पूंजी मानती है। चुनावी मैदान में आर्थिक वादे तो कई दल कर सकते हैं, परंतु सार्वजनिक जीवन में निर्भयता और गरिमा का जो वातावरण महिलाओं के बीच स्थापित हुआ है, उस अटूट विश्वास को चुनौती देना किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए सहज नहीं होगा। सुरक्षा का यह अहसास महिलाओं को एक स्वतंत्र और निर्णायक वोटबैंक में बदल चुका है।

निर्णायक नेतृत्व की विश्वसनीयता और भावी चुनौतियां
अंततः, यह प्रश्न एकाधिकारी, स्वतंत्र और निर्णायक नेतृत्व की विश्वसनीयता का भी है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविध राज्य में जनता प्रायः एक ऐसे “मजबूत और सख्त” चेहरे को चुनना पसंद करती है, जिसकी कमान किसी गठबंधन के जोड़-तोड़, आंतरिक अंतर्विरोधों या किसी रिमोट कंट्रोल के हाथ में न दिखे। लगातार दो कार्यकाल के बाद भी, योगी आदित्यनाथ की पहचान एक ऐसे बेबाक प्रशासक की बनी हुई है, जो राज्य के हित में कड़े और अप्रिय फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटता। फिर भी, राजनीति का एक अटल नियम यह भी है कि जीत का रथ कई पहियों पर चलता है। सरकार की सफल योजनाओं और उपलब्धियों को आमजन तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सरकार व संगठन का युद्धस्तर पर सक्रिय होना। अतीत की प्रतिष्ठा सफलता का दरवाजा अवश्य खोलती है, लेकिन भविष्य का भरोसा संस्थागत निरंतरता, व्यापक जन-संपर्क और जमीनी समाधानों पर टिकता है। 2027 के चुनाव का अंतिम फैसला कई वास्तविक और व्यावहारिक मानदंडों पर निर्भर करेगा।

लेकिन, इतना तय है कि योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा मानक स्थापित कर दिया है, जो पारंपरिक जातिगत समीकरणों को ध्वस्त करता है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा संगठन से लड़ने की नहीं, बल्कि योगी की इस विशिष्ट छवि और उनके बनाए इस 'सुशासन एवं सुरक्षा' के मॉडल का विकल्प प्रस्तुत करने की होगी।

•    नितिन श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार
•    संपर्क – +91-9415552949

 

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