क्या बांग्लादेश बन रहा है ‘दूसरा पाकिस्तान’? ISI, कट्टरपंथ और भारत की बढ़ती चिंता

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लाहौर
1971 में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में पाकिस्तान से आजाद होकर एक धर्मनिरपेक्ष और संप्रभु राष्ट्र के रूप में उभरा बांग्लादेश आज अपनी राजनीतिक और रणनीतिक दिशा के सबसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। मुजीबुर रहमान के नाती और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे सजीव वाजेद जॉय के हाल ही में दिए गए एक बयान ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है।

दिल्ली में फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम को वर्चुअल संबोधित करते हुए वाजेद ने दावा किया कि बांग्लादेश भारत की पूर्वी सीमा पर "दूसरा पाकिस्तान" बनता जा रहा है। इस कार्यक्रम में अगस्त 2024 में सत्ता गंवाने के बाद शेख हसीना ने भी पहली बार सार्वजनिक रूप से हिस्सा लिया और दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का ऐलान किया।

क्या सचमुच बांग्लादेश में पाकिस्तान और ISI का प्रभाव बढ़ रहा है?
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार (मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में) और वर्तमान बीएनपी (BNP) शासन के दौरान बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों में अप्रत्याशित नरमी देखी गई है। सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बदलाव के कई मेन पॉइंट हैं।

ISI की बढ़ती सक्रियता: सजीव वाजेद का आरोप है कि ढाका में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को 'खुली छूट' मिल गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, ढाका स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में एक समर्पित आईएसआई सेल की बात सामने आई है

उच्च स्तरीय सैन्य व राजनयिक दौरे: पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख और अन्य सैन्य अधिकारियों ने ढाका का दौरा किया, जिसे दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने के नेटवर्क के रूप में देखा जा रहा है।

सीधी कनेक्टिविटी और वीजा में छूट: दशकों से बंद कराची-चिटगांव सीधे समुद्री व्यापार मार्ग को फिर से शुरू किया गया, सीधी उड़ानों पर लगी रोक हटी और राजनयिकों व सैन्य कर्मियों के लिए वीजा-मुक्त पहुंच पर सहमति बनी।

कट्टरपंथ और सेना का 'इस्लामीकरण'
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में कट्टरपंथ और धर्म का प्रभाव बढ़ा है।

शेख हसीना सरकार के दौरान आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंधित किए गए 'जमात-ए-इस्लामी' जैसे कट्टरपंथी संगठनों से प्रतिबंध हटा दिया गया।

हिज्ब-उत-तहरीर (Hizb-ut-Tahrir) जैसे संगठनों द्वारा खुलेआम रैलियां निकालना और जेलों से सजायाफ्ता आतंकवादियों की रिहाई क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बनी है।

इतना ही नहीं बांग्लादेश सेना में चार खलीफाओं के नाम पर नई इकाइयां बनाई गईं और कुछ सैन्य बटालियनों के युद्ध घोष को बदलकर 'अल्लाह-हू-अकबर' किया गया।

भारत का रुख क्या है?
सजीव वाजेद की इस चेतावनी पर भारत का रुख संतुलित और व्यावहारिक बना हुआ है।

भारत सरकार ने साफ किया कि शेख हसीना या उनके बेटे की ओर से दिए गए बयानों से भारत सरकार का कोई लेना-देना नहीं है और न ही वह इन विचारों का समर्थन करती है।

भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने कहा है कि वह बांग्लादेश के सीमावर्ती घटनाक्रमों पर "कड़ी नजर" रख रही हैं, हालांकि वर्तमान में सीमा पर किसी सीधे बड़े आतंकी खतरे का फ्लैग जारी नहीं किया गया है।

4,000 किलोमीटर से लंबी सीमा, व्यापार, बिजली सप्लाई और क्षेत्रीय स्थिरता के कारण ढाका और नई दिल्ली दोनों एक-दूसरे को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

क्या बांग्लादेश इतिहास दोहरा रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की तुलना पाकिस्तान के 'हाइब्रिड मॉडल'- जहां सेना सीधे सरकार चलाती है, से पूरी तरह करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि ढाका में नागरिक प्रशासन और बीएनपी सरकार ही नीतियां तय कर रही है।

हालांकि, भारत के लिए अपने पूर्वी मोर्चे पर ISI का बढ़ता प्रभाव और बढ़ता कट्टरपंथ निश्चित रूप से एक नई सुरक्षा चुनौती पेश करता है। भारत का प्रयास अब नई ढाका सरकार के साथ ऐसे कूटनीतिक संतुलन को तलाशने का है, जिससे भारत की सुरक्षा चिंताएं हल हों और बांग्लादेश की विकास से जुड़ी जरूरतें पूरी हों।

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