दिल्ली का ऐतिहासिक जयपुर पोलो ग्राउंड खाली कराया गया, लीज खत्म होने पर प्रशासन की कार्रवाई

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नई दिल्ली
लगभग 15.20 एकड़ में फैला जयपुर पोलो ग्राउंड रेस कोर्स इलाके में स्थित है। जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय ने 1930 के आसपास दिल्ली पोलो क्लब को यह भूमि उपहार स्वरूप दी थी। वे खुद भी पोलो के मशहूर खिलाड़ी थे। तब से यह मैदान पोलो की धड़कन बना रहा। बेशक, दिल्ली का यह ग्राउंड उनके सपनों का विस्तार था। एक ऐसा मैदान, जो बिलियर्ड टेबल जितना चिकना हो। यहां राजकुमारों, सेना अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की टापें गूंजी। 1975 में ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स (अब किंग चार्ल्स) ने यहां मैच खेला। लेकिन इतिहास सिर्फ विजयों का नहीं, दर्द का भी गवाह है।

नवाब इफ्तिखार अली खान पटौदी सीनियर यहां 5 जनवरी 1952 को पोलो खेलते हुए घोड़े से गिर गए थे और उनकी मृत्यु हो गई थी। उस दिन उनके बेटे, क्रिकेट लीजेंड मंसूर अली खान पटौदी का 11वां जन्मदिन था। वे वहां मौजूद थे। यह घटना दिल्ली के पटौदी की त्रासदी से प्रिंस चार्ल्स के मैच तक, अनगिनत किस्सों का मैदान खेल इतिहास की एक दुखद कड़ी बनी। फिर भी मैदान खिलाड़ियों का आकर्षण बना रहा। जिंदल पैंथर्स, पद्मनाभ सिंह जैसी टीमों ने यहां रोमांचक मुकाबले खेले।

सांसों का हिस्सा
 यह ग्राउंड सिर्फ खेल का मैदान नहीं, दिल्ली की सांसों का हिस्सा रहा। हरे-भरे पेड़ों और खुली हवा से घिरा जयपुर पोलो ग्राउंड प्रदूषण की मार झेलती राजधानी को थोड़ी राहत देता था। जयपुर पोलो ग्राउंड अब स्मृतियों की धूल में सिमट जाएगा। फिर भी, जो विरासत एक बार रची जाती है, वह कभी पूरी तरह मिटती नहीं। वह हवा में, कहानियों में और उन दिलों में बसती है, जिन्होंने कभी यहां घोड़ों की गति महसूस की।

जयपुर के और भी प्रतीक
 इस बीच, राजधानी में में जयपुर के कई अन्य महत्वपूर्ण प्रतीक भी मौजूद हैं। राष्ट्रपति भवन परिसर में जयपुर स्तंभ है। यह करीब 145 फीट ऊंचा है। जब देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित हुई, उस खुशी में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय ने इसे ब्रिटिश सरकार को भेंट किया था। नई दिल्ली के निर्माण के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने रायसीना क्षेत्र को चुना था। उन दिनों यह क्षेत्र जयपुर राज्य की संपत्ति था। महाराजा ने यह क्षेत्र ब्रिटिश सरकार को सौंपा और इस भेंट को जीवंत बनाए रखने के लिए वायसराय हाउस (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) में जयपुर स्तंभ का निर्माण करवाया गया। इस पर महाराजा द्वारा भेजा गया चांदी का शुभकामना प्रतीक लगा है, जिस कारण इसे जयपुर स्तंभ कहा जाता है।

जयपुर से कनॉट प्लेस तक
जयपुर रियासत के राजा जय सिंह द्वितीय ने कनॉट प्लेस में राजधानी के सबसे प्राचीन हनुमान मंदिर का 1724 में जीर्णोद्धार करवाया था। उन्होंने हनुमान मंदिर से सटे शिव मंदिर की महत्ता को देखते हुए उसका भी जीर्णोद्धार कराया। जय सिंह द्वितीय ने ही कनॉट प्लेस के पास संसद मार्ग पर जंतर मंतर का निर्माण करवाया था। यह एक खगोलीय वेधशाला है, जिसका निर्माण 1724 में हुआ था। राजस्थान मामलों के जानकार और लेखक गोपेन्द्र नाथ भट्ट ने बताया कि कनॉट प्लेस के पास स्थित राजा बाजार भी जयपुर महाराजा के अधिकार क्षेत्र में था।

IPA ने कहा, कानूनी लड़ाई जारी रहेगी
केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएडडीओ) ने शनिवार को दिल्ली के रेस कोर्स क्षेत्र स्थित 15.20 एकड़ के जयपुर पोलो ग्राउंड का कब्जा अपने हाथ में ले लिया। यह कार्रवाई 20 मई को जारी बेदखली आदेश के बाद की गई, जिसमें एलएंडडीओ ने जमीन को वृहद सार्वजनिक उद्देश्य और जनहित के लिए आवश्यक बताते हुए कब्जा मागा था। हालांकि, आदेश में जमीन के प्रस्तावित उपयोग का उल्लेख नहीं किया गया था। इंडियन पोलो एसोसिएशन (आईपीए) ने इस कार्रवाई को गलत, मनमाना और कानून के विपरीत बताया है। आईपीए के वकील मेजर (सेवानिवृत्त) निर्विकार सिह ने कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए एसोसिएशन फिलहाल कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं करेगी।

 

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