उत्तराखंड सूचना आयोग सख्त: जजों के खिलाफ शिकायतों की जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश

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देहरादून
उत्तराखंड सूचना आयोग ने न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरुद्ध मिली शिकायतों का विवरण सार्वजनिक करने का आदेश दिया है। आयोग ने गोपनीयता की आड़ में सूचना रोकने की कोशिश कर रहे उच्च न्यायालय के लोक सूचना अधिकारी की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जनता को यह जानने का हक है कि कितने अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई है। भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने 14 मई 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से अधीनस्थ न्यायपालिका के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार और कदाचार की शिकायतों से संबंधित चार बिंदुओं पर सूचना मांगी थी।

उन्होंने 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच प्राप्त कुल शिकायतों की संख्या और उन मामलों का ब्यौरा मांगा था जिनमें आपराधिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी। खास बात यह है कि ऐसे ही मामलों में दिल्ली और चेन्नई उच्च न्यायालय इस तरह की सूचना दिए जाने से मना कर चुके हैं। इसलिए भी यह मामला एक तरह की नजीर है। लोक सूचना अधिकारी ने पहले इन जानकारियों को 'गोपनीय' और 'तृतीय पक्ष' से संबंधित बताते हुए देने से इनकार कर दिया था। अधिकारी का तर्क था कि ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराने के लिए मुख्य न्यायाधीश की अनुमति आवश्यक है। हालांकि, सुनवाई के दौरान संजीव चतुर्वेदी ने संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए इसे सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताया।
मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने उभय पक्षों को सुनने के बाद आदेश दिया कि शिकायतों की संख्या और उन पर की गई कार्रवाई की अनुशंसा की संख्या गोपनीय नहीं हो सकती। उन्होंने लोक सूचना अधिकारी को निर्देशित किया कि वे सक्षम स्तर से अनुमोदन प्राप्त कर एक माह के भीतर यह वांछित सूचना अपीलार्थी को उपलब्ध कराएं।

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