UGC का ‘इक्विटी कार्ड’ विवाद: लखनऊ से दिल्ली यूनिवर्सिटी तक छात्रों में तनाव
नई दिल्ली
यूजीसी के ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ ने उच्च शिक्षा जगत को 2 हिस्सों में बांट दिया है. इन दिनों दिल्ली, लखनऊ, पटना और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में जो चल रहा है, उससे पता चलता है कि यह विवाद अब जमीनी संघर्ष बन चुका है. एक तरफ नियमों को ‘ऐतिहासिक’ मानकर समर्थन में मार्च निकाले जा रहे हैं तो दूसरी तरफ इसे ‘पूर्वाग्रह से ग्रसित’ बताकर इसके खिलाफ अदालतों और सड़कों पर मोर्चा खोला गया है.
प्रशासनिक स्तर पर यूजीसी का तर्क है कि कैंपस में बढ़ते मानसिक उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अब तक के मौजूद तंत्र (जैसे एंटी-रैगिंग सेल) नाकाफी साबित हुए हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में विरोध कर रहे संगठनों का मानना है कि इन नियमों की आड़ में एक खास वर्ग को लक्षित किया जा रहा है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समर्थन में उतरे छात्रों पर हुई पुलिसिया सख्ती ने इस पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है. इस विवाद की हर परत को यहां विस्तार से समझिए.
समर्थन का पक्ष: क्यों जरूरी हैं यूजीसी के नियम?
नियमों का समर्थन कर रहे छात्र संगठनों (जैसे AISA, SFI, NSUI और अन्य दलित-पिछड़ा वर्ग संगठन) का तर्क है कि ‘संस्थागत हत्याओं’ (Institutional Murders) को रोकने के लिए सख्त कानूनों की जरूरत है.
बढ़ती शिकायतों का सच: यूजीसी के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना की शिकायतों में 118% की वृद्धि दर्ज की गई है.
स्वतंत्र जांच तंत्र: समर्थकों का कहना है कि वर्तमान में भेदभाव की जांच वही प्रशासन करता है जिस पर आरोप होता है. नए नियम बाहरी निगरानी की वकालत करते हैं, जो निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेगा.
लखनऊ का ‘समता संवर्धन मार्च’: लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों ने मांग की कि ‘उच्च शिक्षा सामाजिक न्याय आयोग’ का गठन हो, जिससे फेलोशिप में देरी और पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन (Biased Evaluation) जैसे मुद्दों पर कानूनी जवाबदेही तय की जा सके.
विरोध का पक्ष: क्या हैं आशंकाएं?
सवर्ण समाज समन्वय समिति (Coordination Committee) और कई ‘सामान्य श्रेणी’ के छात्र संगठनों ने इसे ‘काला कानून’ करार दिया है. उनके विरोध के मुख्य बिंदु नीचे लिखे हैं:
सुरक्षात्मक प्रावधानों का अभाव: विरोधियों का आरोप है कि 2025 के शुरुआती ड्राफ्ट में ‘झूठी शिकायत’ करने वालों पर दंड का प्रावधान था, जिसे आखिरी नोटिफिकेशन से हटा दिया गया है. इससे निर्दोष छात्रों और शिक्षकों को फंसाए जाने का डर है.
प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: नए नियमों में ‘सबूत का भार’ (Burden of Proof) आरोपी पर डाल दिया गया है. यानी, अगर किसी पर भेदभाव का आरोप लगता है तो उसे खुद को निर्दोष साबित करना होगा, जो भारतीय दंड संहिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है.
भेदभाव की ‘अस्पष्ट’ परिभाषा: विरोधियों का तर्क है कि ‘अपमानजनक व्यवहार’ की परिभाषा इतनी व्यापक और अस्पष्ट रखी गई है कि सामान्य शैक्षणिक चर्चाओं को भी इसके दायरे में लाकर किसी का करियर बर्बाद किया जा सकता है.
कैंपस की मौजूदा स्थिति: लखनऊ से दिल्ली यूनिवर्सिटी तक का हाल
हालिया घटनाक्रमों ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समर्थन में उतरे छात्रों को जिस तरह पुलिस ने घसीटकर हिरासत में लिया, उसने समर्थकों का आक्रोश बढ़ा दिया है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में सवर्ण संगठनों ने यूजीसी मुख्यालय का घेराव कर चेतावनी दी है कि अगर इन नियमों को वापस नहीं लिया गया तो देशव्यापी आंदोलन होगा. कई प्रोफेसर ने भी अपनी पहचान गुप्त रखते हुए कहा है कि ये नियम कैंपस में ‘मुक्त संवाद’ (Free Speech) का माहौल खत्म कर सकते हैं.
यूजीसी विवाद: इन 5 धाराओं ने कैंपस को ‘अखाड़ा’ बना दिया
यूजीसी इक्विटी कार्ड विवाद समझने के लिए आपको वो 5 धाराएं भी पता होनी चाहिए, जिनकी वजह से विभिन्न यूनिवर्सिटी में माहौल गर्माया हुआ है.
धारा 4.2: ‘भेदभाव’ की विस्तृत और अस्पष्ट परिभाषा- इस धारा के तहत ‘जातिगत भेदभाव’ की परिभाषा को इतना व्यापक बना दिया गया है कि इसमें किसी छात्र की शैक्षणिक आलोचना, उपहास या उसे किसी समूह से बाहर रखना भी शामिल है.
विवाद की वजह: विशेषज्ञों का मानना है कि ‘उपहास’ या ‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’ व्यक्तिपरक (Subjective) हो सकते हैं. विरोधियों को डर है कि सामान्य शैक्षणिक चर्चाओं या चुटकुलों को भी इस धारा के तहत ‘अपराध’ की श्रेणी में लाकर प्रोफेसरों और छात्रों को लक्षित किया जा सकता है.
धारा 6.1 (ख):आरोपी पर ‘सबूत का भार’- आमतौर पर किसी भी कानून में शिकायतकर्ता को आरोप साबित करना होता है, लेकिन इस क्लॉज ने इसे पलट दिया है.
विवाद की वजह: अगर किसी छात्र ने भेदभाव का आरोप लगाया है तो आरोपी छात्र या शिक्षक को साबित करना होगा कि उसने ऐसा नहीं किया. इसे ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के खिलाफ माना जा रहा है.. क्योंकि यह आरोपी को तब तक दोषी मानता है, जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित न कर दे.
धारा 8.4: झूठी शिकायत पर दंड के प्रावधान का हटना- प्रारंभिक ड्राफ्ट (2025) में प्रावधान था कि अगर कोई दुर्भावनापूर्ण तरीके से झूठी शिकायत दर्ज कराता है तो उस पर कार्रवाई होगी. लेकिन 2026 की अंतिम अधिसूचना में यह सुरक्षा कवच हटा दिया गया है.
विवाद की वजह: विरोध कर रहे छात्र संगठनों का तर्क है कि इस क्लॉज के हटने से व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए झूठी शिकायतों की बाढ़ आ सकती है और आरोपी के पास इससे बचने का कोई कानूनी रास्ता नहीं बचेगा.
धारा 10.2: स्वतंत्र ‘लोकपाल’ (Ombudsman) और बाहरी हस्तक्षेप- यह धारा हर विश्वविद्यालय क स्वतंत्र ‘समान अवसर सेल’ और एक बाहरी लोकपाल नियुक्त करने का निर्देश देती है, जो संस्थान के प्रशासन का हिस्सा नहीं होगा.
विवाद की वजह: समर्थकों (जैसे लखनऊ के प्रदर्शनकारी छात्र) के लिए यह सबसे मजबूत बिंदु है क्योंकि यह निष्पक्षता सुनिश्चित करता है. लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन इसे अपनी ‘स्वायत्तता’ (Autonomy) पर हमला मान रहा है क्योंकि अब आंतरिक मामलों का फैसला बाहरी व्यक्ति करेगा.
धारा 12.1: फंड में कटौती और ‘डी-रिकग्निशन’ की शक्ति- यह धारा यूजीसी को अधिकार देती है कि अगर कोई संस्थान इन नियमों को सख्ती से लागू नहीं करता तो उसका वार्षिक फंड (Grants) रोक दिया जाए या उसकी मान्यता रद्द करने की सिफारिश की जाए.
विवाद की वजह: इसे ‘फाइनेंशियल ब्लैकमेलिंग’ के रूप में देखा जा रहा है. कई संस्थानों का तर्क है कि नियमों के क्रियान्वयन में होने वाली मानवीय चूक के लिए पूरे विश्वविद्यालय का फंड रोकना हजारों निर्दोष छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा.
क्या है बीच का रास्ता?
जहां समर्थक इसे सदियों पुराने भेदभाव के खिलाफ ‘संवैधानिक ढाल’ मान रहे हैं, वहीं विरोधी इसे ‘प्रतिशोध का हथियार’ बता रहे हैं. कानून के जानकारों का मानना है कि अगर यूजीसी इसमें ‘झूठी शिकायत पर दंड’ (Safeguard against misuse) का प्रावधान वापस जोड़ दे तो इस विवाद की तीव्रता काफी हद तक कम हो सकती है.
FAQ: यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 विवाद से जुड़े आम सवाल-जवाब
यूजीसी ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ क्या है?
यह यूजीसी की तरफ से जारी किए गए नए दिशा-निर्देश हैं, जिनका उद्देश्य देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, धर्म, लिंग और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है. इसके तहत संस्थानों को एक सख्त निगरानी तंत्र और शिकायत निवारण सेल बनाना अनिवार्य होगा.
विश्वविद्यालयों में इतना बवाल क्यों मचा है?
विवाद की मुख्य वजह नियमों की कठोरता और उनके संभावित दुरुपयोग की आशंका है. जहां एक पक्ष (समर्थक) इसे भेदभाव के खिलाफ ‘सुरक्षा कवच’ मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष (विरोधी) इसे ‘दमनकारी’ और एकतरफा कानून बता रहा है.
’सबूत का भार’ (Burden of Proof) वाला पेंच क्या है?
आमतौर पर शिकायतकर्ता को आरोप साबित करना होता है. लेकिन इन नियमों के अनुसार, अगर किसी छात्र पर भेदभाव का आरोप लगता है तो उस आरोपी छात्र या शिक्षक को साबित करना होगा कि वह निर्दोष है. इसे लेकर कानूनी विशेषज्ञ सबसे ज्यादा आपत्ति जता रहे हैं.
लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र ‘समर्थन’ में क्यों प्रदर्शन कर रहे थे?
समर्थकों का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था भेदभाव रोकने में नाकाम रही है. वे कैंपस में पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन (Biased Marking) और फेलोशिप रोकने जैसी समस्याओं पर स्वतंत्र जांच के लिए ये नियम चाहते हैं.
क्या झूठी शिकायत करने वालों के लिए कोई सजा है?
यूजीसी के नए नियमों के अंतिम ड्राफ्ट से ‘झूठी शिकायत पर कार्रवाई’ का क्लॉज हटा दिया गया है. विरोधियों का सबसे बड़ा डर यही है कि इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए किया जा सकता है.
क्या यूजीसी किसी कॉलेज का फंड भी रोक सकता है?
हां, इन नियमों में प्रावधान है कि अगर कोई संस्थान इन गाइडलाइंस को लागू नहीं करता या दोषी पाए जाने पर कार्रवाई नहीं करतातो यूजीसी उसकी ग्रांट (Grant) रोक सकता है और उसकी मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है.
’बाहरी लोकपाल’ (External Ombudsman) की क्या भूमिका है?
नियमों के तहत भेदभाव की शिकायतों की जांच विश्वविद्यालय का प्रशासन नहीं, बल्कि एक ‘बाहरी लोकपाल’ करेगा. इसका उद्देश्य जांच को निष्पक्ष और आंतरिक दबाव से मुक्त रखना है.
