पाकिस्तान की नई रणनीति: अमेरिका-इजरायल को चुनौती देने के लिए ‘इस्लामिक नाटो’ में तुर्की का शामिल होना
इस्लामाबाद
मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में बड़ा बदलाव होता दिख रहा है. सऊदी अरब और परमाणु ताकत वाले एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान के बीच बने रक्षा गठबंधन में तुर्की शामिल होने की कोशिश कर रहा है. इस संभावित त्रिपक्षीय सैन्य समझौते को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने वाला कदम माना जा रहा है. इजरायल को मिडिल ईस्ट में काउंटर करने के लिए यह जरूरी है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की की इस गठबंधन में एंट्री को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और समझौता होने की पूरी संभावना है. यह रक्षा समझौता सितंबर 2024 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ था, जिसमें कहा गया था कि किसी एक देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा. यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल-5 से मिलता-जुलता है, जिसमें तुर्की पहले से सदस्य है.
क्यों अहम है यह गठबंधन?
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यह गठबंधन हुआ तो तीनों देश एक-दूसरे की ताकत बढ़ाएगे. ऐसा इसलिए क्योंकि तीनों देशों की ताकत एक-दूसरे को पूरक बनाती है.
सऊदी अरब के पास अपार आर्थिक संसाधन हैं.
पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइलें और बड़ी सैन्य ताकत है.
तुर्की के पास युद्ध का अनुभव, मजबूत सेना और उन्नत रक्षा उद्योग है.
तुर्की क्यों इस गठबंधन में होगा शामिल?
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहात अली ओजकान के अनुसार, अमेरिका की नीतियों में अनिश्चितता और डोनाल्ड ट्रंप की नाटो को लेकर प्रतिबद्धता पर सवालों के बीच देश वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे तलाश रहे हैं. यह कदम तुर्की और सऊदी अरब के रिश्तों में आए बड़े बदलाव को भी दर्शाता है. लंबे समय तक सुन्नी दुनिया की अगुवाई को लेकर दोनों में टकराव रहा है. लेकिन अब दोनों देश रक्षा और आर्थिक सहयोग बढ़ा रहे हैं. हाल ही में तुर्की में दोनों देशों के बीच पहली बार नौसैनिक वार्ता भी हुई. वहीं दूसरी तरफ तुर्की और पाकिस्तान के बीच पहले से गहरे सैन्य संबंध हैं. तुर्की पाकिस्तान के लिए युद्धपोत बना रहा है, उसके F-16 लड़ाकू विमानों को अपग्रेड कर चुका है और ड्रोन तकनीक भी साझा कर रहा है. अब तुर्की चाहता है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान उसके स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट ‘कान’ में भी शामिल हों.
क्या भारत के कारण पाकिस्तान ने की डील?
यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों को भारत ने जोरदार हमले से तबाह किया था. वहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते भी बेहद तनावपूर्ण हैं. तुर्की और कतर ने दोनों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की थी, लेकिन बातचीत बेनतीजा रही. तुर्की अब बातचीत कराने से पीछे हट गया है. अगर तुर्की इस रक्षा गठबंधन में औपचारिक रूप से शामिल होता है, तो यह सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया और अफ्रीका में भी भू-राजनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकता है.
