ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान की एंट्री, अब तक 9 मुस्लिम देशों ने दिया समर्थन

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वाशिंगटन
पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गठित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के निमंत्रण को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया है। यह संस्था मुख्य रूप से गाजा में युद्ध विराम लागू कराने और युद्ध से तबाह हुए क्षेत्र के पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए बनाई गई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान जारी कर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के इस बोर्ड में शामिल होने के फैसले की पुष्टि की।
 
मंत्रालय ने कहा, 'पाकिस्तान का यह कदम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के तहत गाजा शांति योजना का समर्थन करने के प्रयासों का हिस्सा है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस मंच के जरिए स्थायी युद्धविराम, मानवीय सहायता में वृद्धि और गाजा का पुनर्निर्माण सुनिश्चित होगा।' बयान में स्पष्ट किया गया कि पाकिस्तान 1967 से पहले की सीमाओं और 'अल-कुद्स अल-शरीफ' (यरूशलेम) को राजधानी मानकर एक स्वतंत्र फिलिस्तीन देश के गठन का पक्षधर है।

क्या है 'बोर्ड ऑफ पीस'?
राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले साल सितंबर में गाजा युद्ध को समाप्त करने की अपनी योजना के तहत इस बोर्ड का प्रस्ताव रखा था। इसमें कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया है। ट्रंप खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। हालांकि शुरुआत गाजा से हुई, लेकिन अब इसके जरिए अन्य वैश्विक संघर्षों को सुलझाने का लक्ष्य भी रखा गया है।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, बोर्ड में स्थायी सीट के लिए 1 अरब डॉलर (करीब 8300 करोड़ रुपये) के योगदान का अनुरोध किया गया है, हालांकि पाकिस्तान या सऊदी अरब के आधिकारिक बयानों में इस भुगतान का जिक्र नहीं है।

मुस्लिम देशों का बड़ा समर्थन
पाकिस्तान के साथ ही अब तक 9 मुस्लिम बहुल देश इस बोर्ड का हिस्सा बनने पर सहमत हुए हैं। इनमें गाजा मध्यस्थता में अहम भूमिका निभाने वाले कतर और तुर्किये भी शामिल हैं। सऊदी अरब ने एक साझा फैसले की घोषणा करते हुए बताया कि सऊदी अरब, कतर, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों ने इसका समर्थन किया है। इसके अलावा, कुवैत ने भी अलग से इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि की है।

इजरायल और हमास के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए यह बोर्ड एक प्रशासक की भूमिका निभा सकता है। पाकिस्तान का मानना है कि इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी मौजूदगी फिलिस्तीन के भाइयों और बहनों की पीड़ा को कम करने और उनके आत्मनिर्णय के अधिकार को दिलाने में मददगार साबित होगी।

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