युद्ध के संकट में दुबई रियल एस्टेट, अरबों डॉलर के निवेश पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

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 दुबई

सपनों की नगरी दुबई, जहां आसमान छूती कांच की इमारतें और समंदर की लहरों पर बसते आलीशान विला हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं. आम इंसान के लिए यह एक ख्वाब है, तो रईसों और बॉलीवुड सितारों के लिए दूसरा घर, लेकिन युद्ध के साए में इसकी चमक फीकी पड़ती दिख रही है।  

भीषण संघर्ष और मिसाइल हमलों ने यहां की रौनक को फीका करना शुरू कर दिया है. सवाल सिर्फ पर्यटन का नहीं, बल्कि उन अरबों रुपयों का है जो इस शहर की रियल एस्टेट में लगे हैं. क्या युद्ध की ये चिंगारी दुबई के चमकते भविष्य को झुलसा देगी. दुबई की उस 'सेफ हेवन' वाली छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस शहर को निवेश का सबसे सुरक्षित माना जाता था, क्या अब वहां के करोड़ों के निवेश पर युद्ध का साया मंडरा रहा है। 

दुबई का रियल एस्टेट मार्केट पिछले कुछ समय से अपने सबसे बेहतरीन दौर से गुजर रहा था. साल 2025 इसके लिए ऐतिहासिक रहा, जहां 187 मिलियन डॉलर की रिकॉर्ड तोड़ प्रॉपर्टी सेल्स दर्ज की गई. यही नहीं दुनिया भर के हजारों नए करोड़पति अपनी संपत्ति और परिवार के साथ यूएई में शिफ्ट हुए. इसका मुख्य कारण यहां का वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा थी. दुबई की पूरी अर्थव्यवस्था उसकी सुरक्षा और स्थिरता पर टिकी है. लेकिन हाल ही में हुए ईरानी मिसाइल हमलों और क्षेत्र में बढ़ते युद्ध के माहौल ने इस 'सुरक्षित ठिकाने' वाली छवि को हिलाकर रख दिया है. निवेशकों के मन में अब यह डर बैठने लगा है कि क्या युद्ध की स्थिति में उनकी की संपत्ति सुरक्षित रहेगी। 

दुबई का रियल एस्टेट मार्केट खतरे में

भारतीय निवेशकों का बड़ा दांव

दुबई के रियल एस्टेट की चमक में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है. कुल ट्रांजैक्शंस का लगभग 25% से 30% हिस्सा भारतीय नागरिकों या एनआरआई (NRIs) का होता है. भारत के कई दिग्गज डेवलपर्स भी वहां बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स लॉन्च कर रहे हैं. युद्ध के इस माहौल ने न केवल व्यक्तिगत निवेशकों, बल्कि इन बड़े भारतीय कॉर्पोरेट्स की चिंता भी बढ़ा दी है। 

मार्केट में एक और बड़ी चिंता 'सप्लाई और डिमांड' के संतुलन को लेकर है. साल 2026 तक दुबई में लगभग 1.2 लाख नई रेजिडेंशियल यूनिट्स बाजार में आने वाली हैं. यह संख्या सामान्य वार्षिक आपूर्ति से दोगुनी है। 

क्या पीछे हट रहे हैं विदेश खरीदार?

अगर युद्ध के तनाव के कारण विदेशी खरीदार पीछे हटते हैं, तो मार्केट में घरों की बाढ़ आ जाएगी. विशेषज्ञों का अनुमान है कि मांग में कमी आने पर प्रॉपर्टी की कीमतें 3% से 7% तक गिर सकती हैं. तनाव का असर जमीन पर दिखने लगा है. इजराइल की स्ट्राइक के बाद से दुबई में प्रॉपर्टी देखने आने वालों की संख्या में भारी कमी आई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुर्ज खलीफा जैसे प्रीमियम इलाकों में भी कुछ बड़े निवेशकों ने ऐन वक्त पर डील कैंसिल कर दी है और अपने हाथ खींच लिए हैं। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या डरा हुआ एचएनआई (HNI) निवेशक अपना पैसा दुबई से निकालकर भारत के उभरते लग्जरी रियल एस्टेट मार्केट की ओर ले जाएगा? या फिर यह पूंजी सिंगापुर और लंदन जैसे पारंपरिक सुरक्षित बाजारों की ओर रुख करेगी. आने वाले कुछ महीने दुबई के भविष्य की दिशा तय करेंगे। 

रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि जिन खरीदारों ने पहले ही दुबई में अपने घर बुक कर लिए हैं, वे अब सौदे की शर्तों पर फिर से बातचीत कर सकते हैं या भारी डिस्काउंट की मांग कर सकते हैं. वहीं, नए खरीदार फिलहाल 'देखो और इंतजार करो' (wait-and-watch) की नीति अपना रहे हैं, ताकि स्थिति पूरी तरह स्थिर होने के बाद ही कोई कदम उठा सकें. जानकारों का यह भी कहना है कि कुछ निवेशक अपना पैसा अब दुबई से हटाकर भारत के प्रीमियम रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स की ओर मोड़ सकते हैं। 

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह संघर्ष लंबा खींचता है, तो मार्केट में ट्रांजैक्शन वॉल्यूम, नए प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग और निवेशकों के भरोसे में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है. आने वाले महीनों में मध्यम वर्ग के खरीदार ज्यादा आक्रामक तरीके से मोलभाव कर सकते हैं, जबकि डेवलपर्स नए प्रोजेक्ट्स को लॉन्च करने के फैसले को फिलहाल टाल सकते हैं.

बड़े निवेशक (HNIs) भी अब बड़े निवेश करने से पहले समय और हालात का दोबारा आंकलन कर रहे हैं और नई प्रतिबद्धताओं को लेकर काफी सतर्क हो गए हैं. अगर अनिश्चितता का यह दौर जारी रहा, तो कम से कम शॉर्ट-टर्म के लिए दुबई से भारत की ओर पूंजी का एक बड़ा पलायन देखने को मिल सकता है। 

 

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