राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज होने के बाद लोकसभा में क्या रुकेगा जस्टिस वर्मा का महाभियोग? सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

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नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 जनवरी) को इस धारणा पर सवाल उठाए हैं कि अगर संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो जाए, और उसी दिन लोकसभा में वही प्रस्ताव स्वीकार किया गया हो तो क्या उसे विफल मान लिया जाएगा। शीर्ष अदालत ने इस विचार पर संदेह जताया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के महाभियोग के लिए लोकसभा द्वारा स्वीकार किए गए प्रस्ताव को विफल माना जाना चाहिए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उनके खिलाफ महाभियोग के लिए 'जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट' के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित करने के लोकसभा स्पीकर के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी। जस्टिस वर्मा ने प्रक्रियागत आधार पर लोकसभा स्पीकर के फैसले को चुनौती दी है। अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने इस बात पर जोर दिया है कि हालांकि उनके महाभियोग के नोटिस लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दिए गए थे, लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने राज्यसभा चेयरमैन द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने का इंतजार किए बिना एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन कर दिया।

मुकुल रोहतगी के क्या तर्क?
उनकी तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि 'जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट' की धारा 3 के एक प्रावधान के तहत, ऐसे मामलों में जहां महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में उठाया जाता है, लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन के बीच संयुक्त परामर्श की परिकल्पना की गई है। उन्होंने तर्क दिया कि इसके बाद ही एक जांच समिति का गठन किया जा सकता है। हालांकि, लोकसभा के महासचिव ने अब इसका जवाब देते हुए कहा है कि राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, जिसका मतलब है कि यह प्रावधान लागू नहीं होगा। मुकुल रोहतगी ने आगे दलील दी कि इस प्रक्रिया का पालन न होने से पूरी जांच ही त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
दूसरी तरफ, लोकसभा के महासचिव ने कोर्ट में कहा कि राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया, इसलिए संयुक्त परामर्श से जुड़ा प्रावधान लागू नहीं होता। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अहम सवाल उठाते हुए पूछा, “अगर एक सदन में प्रस्ताव विफल हो जाए और दूसरे में सफल, तो क्या सफल प्रस्ताव भी अपने आप गिर जाएगा? कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध तो नहीं दिखता।” कोर्ट ने आगे कहा कि संयुक्त जांच समिति तभी बनती है, जब दोनों सदन प्रस्ताव स्वीकार करें। अगर एक सदन प्रस्ताव खारिज कर दे, तो कानून यह नहीं कहता कि दूसरा सदन आगे नहीं बढ़ सकता।

कानून की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या जरूरी
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि कानून की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (purposive interpretation) जरूरी है, ताकि संसद की मंशा को सही तरीके से समझा जा सके। उन्होंने प्रारंभिक तौर पर यह संकेत भी दिया कि वह इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज होने से लोकसभा का प्रस्ताव स्वतः विफल हो जाएगा।

क्या राज्यसभा में प्रस्ताव वास्तव में स्वीकार हुआ था?
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केंद्र से पूछा कि क्या राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव वास्तव में “स्वीकार” किया गया था? इस पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के सभापति ने प्रस्ताव की प्राप्ति को स्वीकार किया था और यह कहा था कि जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिससे यह अप्रत्यक्ष स्वीकृति (implied admission) मानी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या उपसभापति, सभापति के फैसले की समीक्षा कर सकते हैं?

सरकार की दलील
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि सभापति ने न तो प्रस्ताव स्वीकार किया और न ही खारिज,वह सिर्फ यह जांचना चाहते थे कि क्या उसी दिन लोकसभा में भी ऐसा प्रस्ताव लाया गया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह गुरुवार को सुनवाई जारी रखेगा और यह जांचेगा कि जांच समिति गठित करने से पहले लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति के बीच परामर्श न होने से क्या जस्टिस यशवंत वर्मा के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नहीं? कोर्ट ने कहा,“हमें सिर्फ यह देखना है कि क्या इस मामले में हमें हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं?”

 

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