यूपी की चर्चित IAS दिव्या मित्तल ने दिया इस्तीफा, 13 साल की सेवा के बाद लिखी भावुक चिट्ठी

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 लखनऊ
यूपी के तीन जिलों में डीएम के पद पर सेवा दे चुकी आईएएस दिव्या मित्तल ने आईएएस से रिजाइन कर दिया है। रविवार को उनकी सोशल मीडिया पोस्ट से इसकी जानकारी हुई तो पूरे यूपी में हलचल मच गई। दिव्या मित्तल ने त्यागपत्र देने की जानकारी के साथ एक अंतिम चिट्ठी भी लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं। हालांकि, इसमें कहीं यह जिक्र नहीं किया है कि उन्होंने रिजाइन क्यों किया।

कौन हैं आईएएस दिव्या मित्तल?
यूपी की चर्चित आईएएस अधिकारियों में गिनी जाने वाली दिव्या मित्तल 2013 बैच की आईएएस हैं, जिन्हें 2015 में कंफर्मेशन मिला और मेरठ में ज्वांइट मजिस्ट्रेट के पद नियुक्त किया गया। मूलरूप से दिल्ली की रहने वाली 42 वर्षीय दिव्या मित्तल यूपी में तीन जिलों संतकबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया की डीएम रह चुकी हैं। उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम से पीजीडीएम किया है।

कहां-कहां मिली पोस्टिंग?
पद / स्थान                                           अवधि
मेरठ में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट                        नवंबर 2015 से मई 2017
गोंडा में सीडीओ                                 मई 2017 से अप्रैल 2018
कानपुर नगर में संयुक्त प्रबंध निदेशक (UPSIDC)     अप्रैल 2018 से फरवरी 2019
बरेली में उपाध्यक्ष (बरेली विकास प्राधिकरण)     फरवरी 2019 से सितंबर 2020
संत कबीर नगर में डीएम एवं कलेक्टर     सितंबर 2020 से सितंबर 2022
मिर्जापुर में डीएम एवं कलेक्टर     सितंबर 2022 से सितंबर 2023
लखनऊ में प्रतीक्षा सूची में     सितंबर 2023 से फरवरी 2024
लखनऊ में सीईओ (UPRRDA)     फरवरी 2024 से जुलाई 2024
देवरिया में डीएम एवं कलेक्टर     जुलाई 2024 से मई 2026
लखनऊ में विशेष सचिव (राजस्व विभाग)     मई 2026 से अब तक
दिव्या मित्तल ने चिट्‌ठी वाली पोस्ट का पूरा वर्जन

आईएएस दिव्या मित्तल ने लिखा,
    ‘आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है।

    साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर 'सब कुछ' पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।

    बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि 'असंभव' कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है।

    मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूँ। सच यह है कि सबसे ज़्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया। लोग मेरी ख़ुशी में मुझसे ज़्यादा ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे।

    आज आभार से आँखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध माँ, जो अपने गाँव में पहली बार पानी पहुँचता देख कुछ नहीं बोली, बस काँपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है।

   

 

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