वंदे मातरम् का विरोध विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा था, जौहर ने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए अधिवेशन का बहिष्कार किया: डॉ. लालजी प्रसाद

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लखनऊ

उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि औपनिवेशिक भारत में वंदे मातरम् का विरोध पूरी तरह विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा था। वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि देश के स्वाभिमान, राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के अमर बलिदान से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है। वंदे मातरम् के विरोध का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। मुस्लिम लीग के तत्कालीन अध्यक्ष बैरिस्टर सैय्यद अली इमाम ने वर्ष 1909 में अमृतसर अधिवेशन में वंदे मातरम् का विरोध किया था। इसके बाद मुस्लिम लीग के तत्कालीन अध्यक्ष रहे मोहम्मद अली जौहर ने वर्ष 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में वंदे मातरम् का विरोध किया।

कांग्रेस ने वंदे मातरम् के पूर्ण गायन पर रोक लगाने का निर्णय लिया था

डॉ. लालजी प्रसाद ने कहा कि जौहर ने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए अधिवेशन का बहिष्कार भी किया था। मोहम्मद अली जौहर वही नेता थे, जिन्होंने भारत की बजाय येरूशलम में दफन किए जाने की इच्छा जाहिर की थी। जौहर की मृत्यु के बाद उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें भारत में दफन नहीं किया गया। मोहम्मद अली जिन्ना ने भी 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग की बैठक में वंदे मातरम् के विरोध का मुद्दा उठाया था। जिन्ना के विरोध के बाद वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के पूर्ण गायन पर रोक लगाने का निर्णय लिया था। वंदे मातरम् के विरोध को उस दौर की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मोहम्मद अली जौहर और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों ने वर्ष 1930 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन और राजनीतिक सुरक्षा की मांग की थी। ऐसी राजनीतिक मांगों ने आगे चलकर देश के विभाजन की परिस्थितियों को मजबूत करने में भूमिका निभाई।

विरोध करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की होनी चाहिए

डॉ. लालजी प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन-जन में राष्ट्रभावना जगाने वाला महत्वपूर्ण गीत रहा है। इसके साथ देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों और राष्ट्रभक्तों की भावनाएं जुड़ी रही हैं। आजादी के बाद भी वंदे मातरम् को राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान मिला और इसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। देश की राष्ट्रीय भावना और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े ऐसे प्रतीकों का सम्मान किया जाना चाहिए। वंदे मातरम् के पूर्ण गायन का विरोध किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। डॉ. लालजी प्रसाद ने मांग करते हुए कहा कि वंदे मातरम् के पूर्ण गायन का विरोध करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और देश की एकता एवं अखंडता की भावना को मजबूत किया जा सके।

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