अटलांटिक में ठंडा होता रहस्यमयी ‘कोल्ड ब्लॉब’, वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ी

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नई दिल्ली
जहां एक तरफ ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पूरी दुनिया तप रही है और अल-नीनो जैसी घटनाओं ने समंदरों के तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है, वहीं अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के ठीक दक्षिण में एक ऐसी जगह है जो लगातार ठंडी होती जा रही है.

दुनिया के नक्शे पर जहां हर तरफ बढ़ते तापमान को दिखाने वाले लाल और नारंगी रंग के धब्बे नजर आते हैं, वहीं यह हिस्सा एक गहरे नीले धब्बे की तरह चमकता है. वैज्ञानिक इस अजीबोगरीब घटना से हैरान हैं और इसे 'कोल्ड ब्लॉब' या 'नॉर्थ अटलांटिक वार्मिंग होल' का नाम दिया गया है.

नासा के आंकड़ों से यह साफ हुआ है कि साल 1880 से लेकर 2025 तक इस पूरे इलाके में तापमान लगातार गिरा है. जब पूरी दुनिया का औसत तापमान बीते एक दशक में लगभग 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, तब इस ठंडे हिस्से का तापमान करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस तक कम हो गया है, जो वैज्ञानिकों के लिए एक गहरी चिंता और रिसर्च का विषय बन गया है.

क्या है समंदर का 'ग्लोबल कनवर्टर बेल्ट' (AMOC)?
इस रहस्यमयी ठंडक के पीछे की मुख्य वजह महासागरीय धाराओं के एक विशाल नेटवर्क को माना जा रहा है, जिसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) कहा जाता है. यह समंदर के भीतर बहने वाली पानी की एक ऐसी बेल्ट है जो दुनिया भर के मौसम को कंट्रोल करती है. इसका मुख्य काम भूमध्य रेखा के गर्म पानी को उत्तर दिशा (यूरोप और ध्रुवीय क्षेत्रों) की ओर ले जाना और वहां के ठंडे व खारे पानी को नीचे की ओर धकेलते हुए वापस दक्षिण की ओर लाना है.

पानी का यह चक्र इतना विशाल है कि इसे पूरा होने में लगभग 1,000 साल का समय लगता है. यह धारा इतनी शक्तिशाली है कि इसका जलप्रवाह अमेज़न नदी के मुहाने से बहने वाले पानी की तुलना में करीब 90 से 100 गुना अधिक होता है. ब्रिटेन और उत्तर-पश्चिमी यूरोप में सर्दियों के मौसम में जो हल्की नरमी देखी जाती है, वह इसी AMOC द्वारा दक्षिण से लाई जाने वाली गर्मी के कारण ही संभव हो पाती है.

सुस्त पड़ रहा है समंदर का इंजन
जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स (2026) और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (2025) द्वारा प्रकाशित नए रिसर्चों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह 'कोल्ड ब्लॉब' असल में AMOC के कमजोर होने का एक सीधा और खतरनाक लक्षण है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे महासागर में बड़े पैमाने पर मीठा पानी मिल रहा है.

यह मीठा पानी समंदर के खारे पानी को हल्का कर देता है, जिसकी वजह से ठंडा पानी भारी होकर नीचे नहीं बैठ पाता और यह दुनिया की 'कनवर्टर बेल्ट' सुस्त पड़ने लगती है. चूंकि यह बेल्ट अब उत्तर की ओर उतनी गर्मी नहीं भेज पा रही है, इसलिए ग्रीनलैंड के दक्षिण का यह हिस्सा गर्म होने के बजाय लगातार ठंडा होता जा रहा है.

अगर यह प्रणाली इसी तरह कमजोर होती रही, तो समंदर की वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता भी घट जाएगी, जिससे धरती पर ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव और अधिक विनाशकारी हो जाएगा.

भारतीय मॉनसून और दुनिया पर होने वाला भयानक असर
यदि AMOC का यह चक्र पूरी तरह ठप हो जाता है, तो इसके परिणाम हॉलीवुड की डरावनी साइंस-फिक्शन फिल्म (जैसे The Day After Tomorrow) जैसे हो सकते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन और पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि मौजूदा उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो इसी सदी में यह महासागरीय धारा पूरी तरह बंद हो सकती है.

इसके बंद होने से जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है, जिससे वहां भयंकर बर्फीला तूफान और अत्यधिक ठंड का दौर शुरू हो जाएगा. इसका सबसे घातक असर भारत सहित दक्षिण एशिया के मॉनसून सिस्टम पर पड़ेगा.

समंदर के तापमान में इस उथल-पुथल के कारण अल-नीनो की घटनाएं और अधिक शक्तिशाली हो जाएंगी, जो भारतीय मॉनसून को पूरी तरह तबाह कर सकती हैं. भारत की आधी से अधिक कृषि भूमि सिंचाई के लिए मॉनसूनी बारिश पर निर्भर है, ऐसे में मॉनसून का बिगड़ना करोड़ों किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर देगा.

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