‘पानी नहीं तो वोट नहीं’: MP के गांव में चुनाव बहिष्कार का ऐलान, नेताओं की एंट्री पर रोक

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नरसिंहपुर

इन दिनों चांवरपाठा विकासखंड में पेयजल समस्या अत्यंत गंभीर रूप धारण कर चुकी है। बेतहाशा गिरते जमीनी जल स्तर के कारण क्षेत्र के हैंडपंपों ने पानी की जगह हवा उगलना शुरू कर दिया है। जहां कहीं थोड़ा-बहुत पानी मिल भी रहा है, वह लाल-पीला और दूषित है, जिससे ग्रामीण गंभीर बीमारियों के साये में जीने को मजबूर हैं। इस भीषण जल संकट से विकासखंड का ग्राम मानकपुर बिजोरा बुरी तरह प्रभावित है। अनेक बार लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों को लिखित व मौखिक रूप से सूचित करने के बावजूद जब समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं निकला, तो ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे गया।

ग्राम सभा में लिया गया ऐतिहासिक निर्णय

जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की उदासीनता से त्रस्त होकर ग्रामीणों ने गांव में एक विशाल ग्राम सभा का आयोजन किया। इस बैठक में समाज के सभी वर्गों के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वर्षों से चली आ रही इस भीषण पेयजल किल्लत पर गंभीर चर्चा के बाद, ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। ग्रामीणों ने साफ कह दिया है कि जब तक ग्राम बिजोरा में मां नर्मदा का जल पहुंचाकर समस्या का स्थाई समाधान नहीं किया जाता, तब तक ग्रामवासी ग्राम पंचायत, विधानसभा और लोकसभा सहित आगामी सभी चुनावों का पुरजोर बहिष्कार करेंगे और किसी भी मतदान में हिस्सा नहीं लेंगे।

नेताओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध

चुनाव बहिष्कार के साथ ही ग्रामीणों ने यह भी फैसला लिया है कि जब तक पानी की समस्या दूर नहीं होती, तब तक गांव का कोई भी व्यक्ति किसी भी राजनीतिक दल के नेता को अपने निजी या सार्वजनिक कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं करेगा। नेताओं के गांव में प्रवेश पर पूरी तरह रोक रहेगी। ग्रामीणों का कहना है कि अब वे आश्वासनों के झांसे में नहीं आने वाले और अपने हक के लिए यह निर्णायक लड़ाई मिलकर लड़ेंगे।

गर्मी में भूमि पड़ी रहती है खाली, खेतों और घरों में मचा हाहाकार

पानी की कमी के कारण किसान ठंड के सीजन में खेतों में आधा-आधा नोजल चलाकर किसी तरह एक-दो एकड़ में हल्की सिंचाई करते हैं और अपना गुजारा चलाते हैं। गर्मी आते ही हजारों एकड़ भूमि पानी के अभाव में खाली पड़ी रहती है। मार्च के बाद से ही हैंडपंप जवाब देने लगते हैं। गांव में स्थिति इतनी बदतर है कि लोगों को अपने स्वयं के ट्रैक्टरों से सुदूर खेतों में बने कुओं/स्रोतों से टैंकर भरकर पानी लाना पड़ रहा है। मर्रावन से लेकर अमथनु तक लगभग 45 ग्राम हर साल गर्मी में पानी की इस विकट समस्या से जूझते आ रहे हैं। फिर पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है।
 

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की जुबानी

 हमें वर्षों से केवल झूठे आश्वासन मिले हैं, लेकिन गांव की मूल समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है। अब ग्रामवासी चुप नहीं बैठेंगे। हम अपने मौलिक अधिकार (पानी) के लिए एकजुट होकर यह निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं और जब तक पानी नहीं आता, तब तक कोई चुनाव नहीं होगा। – वृन्दावन पटेल, सेवानिवृत्त शिक्षक
    
पिछले 25 वर्षों से हर एक जनप्रतिनिधि के सामने पानी का मुद्दा उठाया गया, लेकिन नतीजा सिफर रहा। वन विभाग ने जो तालाब बनवाया था, वह 15 साल पहले टूट गया। पंचायत ने जल भराव के लिए गहरीकरण कराया, तो बाद में तार फेंसिंग (बाउंड्री) करके वहां प्रवेश वर्जित कर दिया गया। – सतीश पटेल, मीडिया प्रभारी, किसान संघ
    
पानी की कमी के कारण किसान ठंड के सीजन में खेतों में आधा-आधा नोजल चलाकर किसी तरह एक-दो एकड़ में हल्की सिंचाई करते हैं और अपना गुजारा चलाते हैं। गर्मी आते ही हजारों एकड़ भूमि पानी के अभाव में खाली पड़ी रहती है। मार्च के बाद से ही हैंडपंप जवाब देने लगते हैं। – यशवंत पटेल, वरिष्ठ पदाधिकारी, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ

गांव में स्थिति इतनी बदतर है कि लोगों को अपने स्वयं के ट्रैक्टरों से सुदूर खेतों में बने कुओं/स्रोतों से टैंकर भरकर पानी लाना पड़ रहा है। मर्रावन से लेकर अमथनु तक लगभग 45 ग्राम हर साल गर्मी में पानी की इस विकट समस्या से जूझते आ रहे हैं। फिर पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। – द्वारका प्रसाद झारिया, सरपंच ग्राम पंचायत मानकपुर बिजोरा

 

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