धर्म नगरी वाराणसी में 3 से 5 अप्रैल तक होगा महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य का ऐतिहासिक मंचन : मुख्यमंत्री डॉ. यादव
भोपाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि भारतीय काल-गणना के प्रणेता और न्यायप्रियता के प्रतीक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के शौर्य की गाथा अब बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी की गलियों में प्रतिध्वनित होगी। धर्म और संस्कृति की नगरी वाराणसी के बी.एल.डब्ल्यू. मैदान में आगामी 3 से 5 अप्रैल, 2026 (विक्रम संवत् 2083, वैशाख कृष्ण पक्ष) तक भारत के स्वाभिमान और विकास की गाथा का भव्य उत्सव मनाया जाएगा। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस त्रि-दिवसीय कार्यक्रम में महानाट्य 'सम्राट विक्रमादित्य' का ऐतिहासिक मंचन किया जाएगा।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गौरवशाली नेतृत्व में यह आयोजन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को जीवंत करेगा। इस गरिमामय समारोह का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की उपस्थिति में होगा। इस वृहद आयोजन का उद्देश्य देश के गौरवशाली इतिहास, विक्रम संवत् की वैज्ञानिकता और उस युग के अनुपम योगदान से जन-मानस को परिचित कराना है।
बाबा विश्वनाथ को विक्रमादित्य वैदिक घड़ी करेंगे अर्पित
प्राचीन भारतीय कालगणना के ऐतिहासिक केंद्र उज्जैन में पिछले वर्ष विश्व की पहली 'विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' की सफल स्थापना के बाद, अब इसे देश के अन्य ज्योतिर्लिंगों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। भारतीय काल गणना की समृद्ध विरासत को पुनर्जीवित करने के इस प्रयास अन्तर्गत वाराणसी में सर्वप्रथम बाबा विश्वनाथ को यह वैदिक घड़ी समर्पित की जा रही है। इस घड़ी की विशेषता न केवल इसकी पारंपरिक गणना पद्धति है, बल्कि इसका डिजिटल विस्तार भी है। इसके लिए एक विशेष ऐप भी लॉन्च किया गया है जो विश्व की 180 से अधिक भाषाओं में समय और पंचांग की जानकारी उपलब्ध करा रहा है। उज्जैन से शुरू होकर काशी के गलियारों तक पहुँचने वाली यह पहल न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध कर रही है, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने का कार्य भी कर रही है।
महानाट्य के सांस्कृतिक गौरव की निरंतर यात्रा
सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य की यात्रा वर्ष 2007 में प्रारंभ हुई थी। सफलता के सोपान चढ़ते हुए इस नाटक का मंचन अब तक उज्जैन, भोपाल, आगरा और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों में किया जा चुका है, जहाँ हज़ारों दर्शकों ने इसे सराहा है। अप्रैल 2025 में दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर आयोजित इसके मंचन को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी विशेष रूप से सराहा था। उन्होंने इस प्रस्तुति को सम्राट विक्रमादित्य के वैभव और भारतीय गौरव को जन-जन तक पहुँचाने का एक अनुकरणीय प्रयास बताया।
महानाट्य विक्रमादित्य: शौर्य और न्याय का संगम
सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य उज्जैनी के महान सम्राट के जीवन, उनके अदम्य साहस और न्यायप्रियता को जीवंत करता है। नाटक के माध्यम से 57 ईसा पूर्व प्रारंभ हुए 'विक्रम संवत्' के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्त्व को सशक्त संवादों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों को इसमें जहाँ 'सिंहासन बत्तीसी' और 'बेताल पच्चीसी' के रोचक प्रसंग देखने को मिलेंगे, वहीं भविष्य पुराण के गंभीर संदर्भों से भी परिचय होगा।
महानाट्य प्रस्तुति का एक मार्मिक पक्ष विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारतीय ज्ञान, विज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर को पहुँचाई गई क्षति को भी दर्शाना है। इसके साथ ही सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के 'नवरत्नों'—महाकवि कालिदास और महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर—की विद्वता को भी बड़े प्रभावशाली ढंग से मंच पर उतारा गया है।
अत्याधुनिक तकनीक और भव्यता का मेल
सम्राट विक्रमादित्य आधारित महानाट्य की लगभग 1 घंटे 45 मिनट की इस भव्य प्रस्तुति में कला और तकनीक का अद्भुत समन्वय देखने को मिलेगा। मंच पर 175 से अधिक कलाकार और सहयोगी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। नाटक को सजीव बनाने के लिए मंच पर रथ, अश्व (घोड़े), पालकी और ऊँटों का प्रयोग किया जाएगा। तीन अलग-अलग मंचों और अत्याधुनिक ग्राफिक्स व स्पेशल इफेक्ट्स से अलौकिक दृश्य प्रस्तुत किये जाएंगे।
विविध प्रदर्शनियाँ और सामाजिक संकल्प
महानाट्य के साथ-साथ आयोजन स्थल पर विभिन्न ज्ञानवर्धक प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा रही हैं। इनमें सम्राट विक्रमादित्य व अयोध्या, भारतीय ऋषि-वैज्ञानिक परंपरा पर केंद्रित 'आर्ष भारत', शिव पुराण, चौरासी महादेव, हनुमान और मध्यप्रदेश के पवित्र स्थानों की विस्तृत जानकारी प्रदर्शित की जाएगी।
यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि 'स्वच्छ और समृद्ध मध्यप्रदेश' के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। जनसंपर्क विभाग मध्यप्रदेश इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी नागरिकों की सक्रिय भागीदारी का आह्वान करता है, ताकि हम अपनी जड़ों से जुड़कर एक उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकें।
महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य: एक गौरवशाली प्रस्तुति
उज्जैन की पावन धरा और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के स्वर्णिम इतिहास को जीवंत करने के लिए 'महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य' का मंचन एक ऐतिहासिक पहल है। इस भव्य नाटक की परिकल्पना मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा की गई है, जो भारतीय संस्कृति और विरासत के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता को दर्शाती है। इस कालजयी कृति का लेखन पद्म डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने किया है, जिनकी लेखनी ने इतिहास के पन्नों को सजीव कर दिया है। नाटक का कुशल निर्देशन संजीव मालवीय द्वारा किया गया है, जबकि प्रस्तुति संयोजक के रूप में राजेश सिंह कुशवाहा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस गौरवशाली कलाकृति की प्रस्तुति ' विशाला सांस्कृतिक एवं लोकहित समिति, उज्जैन' द्वारा की जा रही है। यह महानाट्य मनोरंजन के साथ नई पीढ़ी को सम्राट विक्रमादित्य के साहस, न्याय और सुशासन के आदर्शों से परिचित कराने का एक सशक्त माध्यम भी है। ऐसी सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हमारी गौरवशाली विरासत को अक्षुण्ण रखने में सहायक सिद्ध होती हैं।
ऐतिहासिक नाटक 'सम्राट विक्रमादित्य' का मुख्य आकर्षण: दिग्गज कलाकारों का सशक्त अभिनय
सम्राट विक्रमादित्य के अदम्य साहस, त्याग और उनके नवरत्नों की विद्वता अब रंगमंच पर अपने अभिनव से रंग बिखेरने को तैयार है। ऐतिहासिक नाटक 'सम्राट विक्रमादित्य' का मुख्य आकर्षण दिग्गज कलाकारों का अभिनय है।नाटक के केंद्रीय पात्र सम्राट विक्रमादित्य की गरिमामयी भूमिका में विक्रम सिंह चौहान और डॉ. राहत पटेल नज़र आएंगे। वहीं, उनके बचपन के संघर्षों को कृष्णा राठौर (बाल विक्रमादित्य) जीवंत करेंगे। कथा को सूत्र में पिरोने का कार्य प्रख्यात सूत्रधार दुर्गेश बाली करेंगे।
राजा गर्दभिल्ल की चुनौतीपूर्ण भूमिका में चेतन शाह और शंकर राव साठे अपने अभियान का प्रदर्शन करेंगे। महारानी वीरमति के रूप में रेणुका देशपांडे और भर्तृहरि के किरदार में सूरज चौधरी दर्शकों को उस कालखंड की याद दिलाएंगे। दर्शकों के लिए विशेष रोमांच का केंद्र बेताल का पात्र होगा, जिसे ऋषि योगी और बंटी सोलंकी निभा रहे हैं।
नवरत्नों और भव्य सैन्य दल का संगम
सम्राट के दरबार की शोभा बढ़ाने वाले प्रसिद्ध नवरत्नों में महाकवि कालिदास (रवि परमार), वराहमिहिर (विकास परिहार) और अमर सिंह (प्रित मीणा) जैसे विद्वान पात्र आकर्षण का केंद्र होंगे। महानाट्य को भव्यता प्रदान करने के लिए सु आरोही आठवले के नेतृत्व में एक विशाल नृत्य दल और विक्रम सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी मंच पर युद्ध और विजय के दृश्यों को सजीव करेगी।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महाकुंभ, 'विक्रमोत्सव' ने स्थापित किए सफलता के नए सोपान
'विक्रमोत्सव' आज केवल एक आयोजन मात्र नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा और सांस्कृतिक स्वाभिमान के पुनर्जागरण का एक वैश्विक महाअभियान बन चुका है। विरासत से विकास की ओर अग्रसर यह उत्सव आस्था और आधुनिकता का वह अनूठा संगम है, जिसने अपनी भव्यता से संपूर्ण विश्व को चमत्कृत किया है। वर्ष 2026 के इस आयोजन में 41 से अधिक बहुआयामी गतिविधियों—जैसे महाकाल वन मेला, अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, और वेद अंताक्षरी—ने इसे नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। 4 हजार से अधिक कलाकारों की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियों और 'ईमैक्स ग्लोबल अवार्ड्स 2025' (Longstanding IP of the year) जैसे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि विक्रमोत्सव अब एशिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मंच के रूप में अपनी अमिट पहचान बना चुका है।
सम्राट विक्रमादित्य सम्मान: न्याय और शौर्य की विरासत को मिला वैश्विक विस्तार
लोक-कल्याण और गौरवशाली परंपराओं को संजोने के इस सफर ने अब तक 17.72 करोड़ से अधिक लोगों के हृदय को छुआ है, जो सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कीर्तिमान है। मध्यप्रदेश सरकार ने युग-निर्माता सम्राट विक्रमादित्य की स्मृति को अक्षुण्ण रखने और उनके न्याय, धर्म व प्रजावत्सल गुणों को समाज में पुनः स्थापित करने के लिए 'सम्राट विक्रमादित्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मान' की स्थापना की है। एक करोड़ 1 लाख रुपये की सम्मान राशि के साथ यह देश का सबसे बड़ा पुरस्कार होने जा रहा है। इसके साथ ही, 21 लाख रुपये का राष्ट्रीय सम्मान और 5-5 लाख रुपये के तीन राज्य स्तरीय सम्मानों की घोषणा कर सरकार ने न केवल अपने महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके शौर्य और उदारता की विरासत को भी सुरक्षित कर दिया है।
सम्राट विक्रमादित्य: शौर्य और न्याय के शाश्वत प्रतीक
सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के वो दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल विदेशी आक्रांताओं (शकों) को पराजित कर राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित किया, बल्कि न्याय, शौर्य और कला के एक स्वर्णिम युग का सूत्रपात भी किया। उज्जैन के इस सार्वभौम सम्राट का शासनकाल भारत के सर्वांगीण विकास का साक्षी रहा है। उनके दरबार के 'नवरत्न', जिनमें महाकवि कालिदास और महान खगोलविद वराहमिहिर जैसे विद्वान शामिल थे, भारत की अद्वितीय बौद्धिक संपदा के प्रतीक रहे हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों, मुद्राओं और चीनी यात्री ह्वेनसांग जैसे विदेशी इतिहासकारों के वृत्तांतों में विक्रमादित्य के वैभवशाली शासन की पुष्टि होती है, जो आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना का गौरवशाली आधार है।
विक्रम संवत: वैज्ञानिक काल-गणना और सांस्कृतिक धरोहर
विक्रम संवत् केवल एक कैलेंडर नहीं, बल्कि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित एक सूक्ष्म और वैज्ञानिक काल-गणना पद्धति है। 57 ईसा पूर्व में प्रारंभ हुआ यह संवत भारतीय नववर्ष 'चैत्र शुक्ल प्रतिपदा' से जुड़ा है, जिसे पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के आरंभ का दिन माना जाता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे गुड़ी पड़वा, उगादी और पोइला बैशाख जैसे विविध नामों से मनाया जाता है, जो प्रकृति और संस्कृति के अटूट जुड़ाव को दर्शाता है। वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान गणितज्ञों द्वारा प्रतिपादित यह पंचांग आज भी काल के सटीक निर्धारण के लिए विश्व में अद्वितीय माना जाता है।
विरासत का पुनर्जागरण और विश्वगुरु का संकल्प
इतिहास के पन्नों में विदेशी आक्रांताओं द्वारा हमारी ज्ञान-परंपरा और स्थापत्य को नष्ट करने के जो प्रयास किए गए, वर्तमान समय उन स्मृतियों को पुनः जीवंत करने का अवसर है। सम्राट विक्रमादित्य को अयोध्या में प्रभु राम के भव्य मंदिर सहित 300 से अधिक मंदिरों के पुनर्निर्माण का श्रेय दिया जाता है। आज का भारत अपनी इस पुरातन शक्ति को पहचानकर 'विश्वगुरु' के रूप में प्रतिष्ठित होने के पथ पर अग्रसर है। विक्रम संवत और सम्राट विक्रमादित्य का गौरव न केवल हमारे मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना को जागृत कर एक नए युग के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।
भगवान राम और कृष्ण जैसे अवतारों के बाद भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नायक सम्राट विक्रमादित्य ही है। भारत वर्ष के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध पुरातन पुरुषों में विक्रमादित्य अग्रणी है। उनकी वीरता, देश को पराधीनता से मुक्त करने की उत्कृष्ट अभिलाषा राजनीतिक उपलब्धियों सैनिक अभियान और विजय यात्राएँ शासन की आदर्श अनोखी विवेकपूर्ण न्यायपद्धति, कला एवं साहित्य की उन्नति में उदार सहयोग तथा सहभागिता जैसे उदात्त गुणों ने भारत ही नहीं आस-पास और सुदूर देशों में भी उन्हें सदा के लिये प्रतिष्ठित कर दिया। शकों ने भारत पर आक्रमण कर आंतक मचाया था। शक राजा महाबली, अर्थलोभी, पापी और दुष्ट थे, क्रूर हिंसक देश विरोधी शकों की उस दुर्दान्त, प्रलयंकारी काली छाया से विक्रमादित्य ने भारत को मुक्त कराया और 18 शक सामन्तों को पराजित कर उन्हें भारत से भागने पर विवश कर दिया था। शकों को खदेड़ कर ही शकारि और साहसांक की उपाधियाँ धारण की। आज भी विकमादित्य द्वारा 2083 वर्ष पूर्व प्रारम्भ विक्रम सम्वत् भारत वर्ष ही नहीं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ कालगणना का आधार है।
बेताल पच्चीसी और सिहांसन बत्तीसी में विक्रमादित्य के अद्भुत, विवेकपूर्ण न्याय, वीरता, शौर्य एवं महानता की कथाएँ सर्वविदित है, जिनके दरबार में नवरत्न कालिदास, वररूचि, वराहमिहिर, क्षपणक, घटकर्पर, अमर सिंह, बेताल भट्ट, शंकु, धन्वन्तरि जैसे प्रसिद्ध नवरत्न सदा जनकल्याणकारी कार्यों में ही लगे रहते थे।
