MP से लेकर हार्वर्ड तक, प्राची धबेल ने दुनिया में भारत का नाम किया रोशन

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भोपाल 

नवाचार अक्सर पहले से मौजूद मान्यताओं पर प्रश्न उठाने से शुरू होता है। मध्य प्रदेश की बेटी और कलाकार प्राची धाबेल देब के लिए इसका अर्थ था सदियों पुराने एक माध्यम को नए सिरे से सोचना और उसकी पारंपरिक सीमाओं से आगे ले जाना। हाल ही में ऑक्सफोर्ड सेंटर फॉर हिंदू स्टडीज में एसोसिएट आर्टिस्ट के रूप में नियुक्त प्राची, ऑक्सफोर्ड में अकादमिक सांस्कृतिक नियुक्ति पाने वाली पहली भारतीय रॉयल आइसिंग कलाकार बन गई हैं। आइए जानते हैं कौन हैं प्राची धबेल देब?

रॉयल आइसिंग अपनी तकनीकी जटिलता और सीमित लचीलापन के लिए जानी जाती है। प्राची ने सालों के प्रयोग और शोध के माध्यम से इन सीमाओं को चुनौती दी और एक शाकाहारी (वीगन) रॉयल आइसिंग फॉर्मूला विकसित किया, जिसमें पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाले अंडे की सफेदी पर निर्भरता समाप्त हो गई। इस महत्वपूर्ण नवाचार ने उन्हें बड़े पैमाने की इंस्टॉलेशन कृतियाँ बनाने की स्वतंत्रता दी, साथ ही उनके कार्य को नैतिक और आधुनिक मूल्यों के अनुरूप भी बनाया।
कौन हैं प्राची धबेल

मध्य प्रदेश के रीवा में जन्मीं देब की परवरिश देहरादून, उत्तराखंड में हुई और उन्होंने अपनी स्कूलिंग कोलकाता में पूरी की। वह पिछले 13-14 सालों से पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ में रह रही हैं और इसे अपनी कर्मभूमि कहती हैं। 36 साल की देब ने बताया कि उन्हें इस इंडस्ट्री में आए 10 साल हो गए हैं। मैं एक आर्टिस्ट के तौर पर अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना चाहती थी और दूसरों के लिए प्रेरणा बनना चाहती थी। जिस फील्ड को लेकर मैं इतनी पैशनेट हूं, उसमें अपने काम के लिए पहचान मिलना मेरे लिए सम्मान की बात है।

देब की बनाई हुई चीजें मिलान कैथेड्रल से प्रेरित 100 किलो का वीगन खाने लायक रॉयल आइसिंग स्ट्रक्चर को वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, यूके में शामिल किया गया है। उनके नाम सबसे ज्यादा वीगन रॉयल आइसिंग स्ट्रक्चर बनाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी है, और वीगन रॉयल आइसिंग से बनाया गया भारतीय महल जैसा 200 किलो का खाने लायक स्ट्रक्चर भी है।

भारतीय वास्तुकला, पवित्र ज्यामितीय आकृतियों और सांस्कृतिक प्रतीकों से प्रेरित उनकी खाद्य कलाकृतियाँ अक्सर महीनों की योजना के बाद आकार लेती हैं। इनमें से कुछ इंस्टॉलेशन सैकड़ों किलोग्राम वजन की होती हैं, जिनमें कलात्मक दृष्टि के साथ-साथ इंजीनियरिंग की सटीकता भी दिखाई देती है।

अपने व्यक्तिगत कार्यों से आगे बढ़कर, प्राची ने वैश्विक शुगर आर्ट समुदाय में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, उन्होंने विश्व रिकॉर्ड बनाए हैं, प्रमुख प्रतियोगिताओं में निर्णायक के रूप में कार्य किया है और विभिन्न देशों में उभरते कलाकारों का मार्गदर्शन किया है।

ऑक्सफोर्ड में उनकी नियुक्ति इस व्यापक बदलाव को दर्शाती है कि नवाचार को अब केवल तकनीक के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचनात्मकता, प्रक्रिया और सांस्कृतिक सोच के रूप में भी देखा जा रहा है। अपनी नई भूमिका में प्राची विरासत, नवाचार और कला की बदलती परिभाषा पर होने वाली चर्चाओं में योगदान देंगी। उनकी कहानी यह दिखाती है कि परंपरा में निहित, सोच-समझकर किया गया नवाचार किस तरह उन क्षेत्रों में भी वैश्विक मंच के द्वार खोल सकता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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