अरावली बचाओ आंदोलन तेज: ग्रामीणों ने पहाड़ियों पर चढ़कर किया विरोध प्रदर्शन, क्या हैं प्रमुख मांगें?

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अलवर

राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर मंडराते संकट को देखते हुए अब ग्रामीण सड़कों से लेकर पहाड़ियों तक लामबंद होने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया गाइडलाइन के बाद, जिसमें 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली श्रृंखला से बाहर मानने की चर्चा है, बानसूर क्षेत्र में विरोध की आग तेज हो गई है। रविवार को बिलाली क्षेत्र में सैंकड़ों ग्रामीणों ने पहाड़ियों पर चढ़कर प्रशासन और न्यायपालिका के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया।

ग्रामीणों ने पहाड़ियों की चोटियों पर तिरंगा और तख्तियां लेकर अरावली बचाओ, भविष्य बचाओ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि अरावली उनके लिए केवल पत्थर के पहाड़ नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा करने वाली एक प्राकृतिक दीवार है। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि इन पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना गया, तो भू-माफिया और अवैध खनन करने वाले लोग इसे पूरी तरह नष्ट कर देंगे।

प्रदर्शन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता ओमप्रकाश गुर्जर ने संबोधित करते हुए कहा कि क्षेत्र में पहले से ही भूजल स्तर चिंताजनक रूप से नीचे जा रहा है। अरावली की ये पहाड़ियां वर्षा जल को रोकने और जमीन को रिचार्ज करने का मुख्य स्रोत हैं। यदि इन्हें अरावली के दायरे से बाहर कर खनन की अनुमति दी गई, तो आने वाली पीढ़ियां पानी की एक-एक बूंद को तरस जाएंगी। अरावली हमारी प्राकृतिक धरोहर और आन-बान-शान का प्रतीक है, जिसे किसी भी कीमत पर मिटने नहीं दिया जाएगा।

सभी छोटी-बड़ी पहाड़ियों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करें
ग्रामीणों का आरोप है कि नई गाइडलाइन से पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को भारी धक्का लगेगा। इससे न केवल वन्यजीवों का आवास छीन जाएगा, बल्कि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया भी तेज होगी। प्रदर्शनकारियों ने सामूहिक रूप से मांग की है कि सरकार और न्यायपालिका जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अरावली की सभी छोटी-बड़ी पहाड़ियों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करें।
चेतावनी: ग्रामीणों ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि यदि उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया, तो यह आंदोलन केवल बानसूर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे पूरे प्रदेश स्तर पर बड़े जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा।

 

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